हरिशंकरी - ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में वृक्ष
पीपल, बरगद और पाकड़ के वृक्षों को एक ही स्थान पर रोपित करने को "हरिशंकरी" कहते हैं। इन्हें इसप्रकार रोपित किया जाता है कि तीनों वृक्षों का एक संयुक्त छत्र विकसित हो तथा तीनों वृक्षों के तने भी एक तने के रूप में दिखाई दें।
हरिशंकरी का महत्व:-
यह कभी भी पूर्ण पत्तीरहित नहीं होती, इसलिए वर्षभर इसकेे नीचे छाया बने रहने के कारण
पथिकों व साधकों को छाया मिलती है। इसकी छाया भी दिव्य औषधीय गुणों से भरपूर होती है; जिससे नीचे बैठने वाले को पवित्रता, पुष्टता और ऊर्जा मिलती है।
इसका घना फैलाव पशु पक्षियों के आश्रय स्थल व भोजन का स्थान बन जाता है। पर्यावरण संरक्षण में हरिशंकरी को उत्तम माना जाता है।ऐसे सभी वृक्षों को धार्मिक स्थलों पर रोपित किया जाना चाहिए।
मनोज कुमार झा"मनु"
आचार्य
तीन देवों का स्वरूप:-
इसका नाम हरिशंकरी है किंतु यह तीन देव हरि= विष्णु, शंकर=शिव व ब्रह्मा का स्वरूप हैं। इसमें पीपल विष्णु जी का, बरगद शिव जी का और पाकड़ ब्रह्मा जी का स्वरूप माने जाते हैं।
वृक्षों का संक्षिप्त विवरण:-
१. पीपल:-
इसे संस्कृत में अश्वत्थ, पिप्पल, बोधिद्रुम, कुंजराशन तथा वैज्ञानिक भाषा में फाइकस रिलीजिओसा कहते हैं।
औषधीय दृष्टि से पीपल शीतल रुक्ष, व्रण को उत्तम बनाने वाला, पित्त, कफ, व्रण तथा रक्त विकार को दूर करने वाला माना जाता है।
गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है अश्वत्थ सर्व वृक्षाणाम अर्थात वृक्षों में मैं पीपल हूं। इसकी छाया घनी होती है। यह 24 घंटे ऑक्सीजन प्रदान करने वाला वृक्ष है। इसके पके फल मीठे और पौष्टिक होते हैं। चिड़िया इसके फलों को खा कर जहां मल त्याग करती हैं वहां थोड़ी सी नमी प्राप्त होने पर ही अंकुरित होकर जीवन से संघर्ष करता है। दूर-दूर तक इसकी जड़ें फैलकर जल प्राप्त कर लेती हैं।इसकी ऐसी दुर्लभ विशेषता है जिसके कारण इसका नाम पिप्पल है।
२. बरगद:-
इसे संस्कृत में वट, न्यग्रोध, बहुपाद, रक्तफल, यक्षावास तथा वैज्ञानिक भाषा में फाइकस बेंगालेंसस कहते हैं।
औषधीय दृष्टि से बरगद बहुत पौष्टिक गुणयुक्त है। इसके दूध को कमर दर्द, सन्धिवात, सड़े हुए दांत, बरसात में होने वाली फोड़े फुंसियों पर लगाने पर लाभ मिलता है। इसकी छाल बहुमूत्र तथा फल मधुमेह में लाभप्रद है।
वटसावित्री व्रत में इस वृक्ष की पूजा की जाती है।
३. पाकड़:-
इसे संस्कृत में प्लक्ष, पर्कटी तथा वैज्ञानिक भाषा में फाइकस इनफेक्टोरिया है। इसका सामान्य नाम पिलखुन है। यह बहुत तेजी से बढ़ता है और घनी छाया प्रदान करता है। औषधीय दृष्टि से यह दाह, पित्त, कफ, रक्तविकार, शोथ एवं रक्तपित्त को दूर करता है।
वृक्षों का संक्षिप्त विवरण:-
१. पीपल:-
इसे संस्कृत में अश्वत्थ, पिप्पल, बोधिद्रुम, कुंजराशन तथा वैज्ञानिक भाषा में फाइकस रिलीजिओसा कहते हैं।
औषधीय दृष्टि से पीपल शीतल रुक्ष, व्रण को उत्तम बनाने वाला, पित्त, कफ, व्रण तथा रक्त विकार को दूर करने वाला माना जाता है।
गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है अश्वत्थ सर्व वृक्षाणाम अर्थात वृक्षों में मैं पीपल हूं। इसकी छाया घनी होती है। यह 24 घंटे ऑक्सीजन प्रदान करने वाला वृक्ष है। इसके पके फल मीठे और पौष्टिक होते हैं। चिड़िया इसके फलों को खा कर जहां मल त्याग करती हैं वहां थोड़ी सी नमी प्राप्त होने पर ही अंकुरित होकर जीवन से संघर्ष करता है। दूर-दूर तक इसकी जड़ें फैलकर जल प्राप्त कर लेती हैं।इसकी ऐसी दुर्लभ विशेषता है जिसके कारण इसका नाम पिप्पल है।
२. बरगद:-
इसे संस्कृत में वट, न्यग्रोध, बहुपाद, रक्तफल, यक्षावास तथा वैज्ञानिक भाषा में फाइकस बेंगालेंसस कहते हैं।
औषधीय दृष्टि से बरगद बहुत पौष्टिक गुणयुक्त है। इसके दूध को कमर दर्द, सन्धिवात, सड़े हुए दांत, बरसात में होने वाली फोड़े फुंसियों पर लगाने पर लाभ मिलता है। इसकी छाल बहुमूत्र तथा फल मधुमेह में लाभप्रद है।
वटसावित्री व्रत में इस वृक्ष की पूजा की जाती है।
३. पाकड़:-
इसे संस्कृत में प्लक्ष, पर्कटी तथा वैज्ञानिक भाषा में फाइकस इनफेक्टोरिया है। इसका सामान्य नाम पिलखुन है। यह बहुत तेजी से बढ़ता है और घनी छाया प्रदान करता है। औषधीय दृष्टि से यह दाह, पित्त, कफ, रक्तविकार, शोथ एवं रक्तपित्त को दूर करता है।
यह लगभग सदा हराभरा रहने वाला वृक्ष है जो जाड़े के अन्त में थोड़े समय के लिये पतझड़ में रहता है.... इसका छत्र काफी फैला हुआ और घना होता है, इसकी शाखायें जमीन के समानान्तर काफी नीचे तक फैल जाती हैं...जिससे घनी शीतल छाया का आनन्द बहुत करीब से मिलता है... इसकी विशेषता के कारण इसे प्लक्ष या पर्कटी कहा गया जो हिन्दी में बिगडक़र क्रमश: पिलखन व पाकड़ हो गया... यह बहुत तेज बढक़र जल्दी छाया प्रदान करता है..शाखाओं या तने पर जटा मूल चिपकी या लटकी रहती है...फल मई जून तक पकते हैं और वृक्ष पर काफी समय तक बने रहते हैं... गूलर की तुलना में इसके पत्ते अधिक गाढ़े रंग के होते हैं जो सहसा काले प्रतीत होते हैं जिसके कारण इस वृक्ष के नीचे अपेक्षाकृत अधिक अन्धेरा प्रतीत होता है...यह घनी और कम ऊँचाई पर छाया प्रदान करने के करण सडक़ों के किनारे विशेष रूप से लगाया जाता है.... इसकी शाखाओं को काटकर रोपित करने से वृक्ष तैयार हो जाता है....।
औषधीय दृष्टि से यह शीतल एवं व्रण, दाह, पित्त, कफ, रक्त विकार, शोथ एवं रक्तपित्त को दूर करने वाला है....इस पेड से जुड़ी कई पौराणिक मान्यताये भी हैं ।।
यज्ञ कर्म के लिए इस वृक्ष की छाया श्रेष्ठ मानी जाती है, वृक्षायुर्वेद के अनुसार घर के उत्तर में पाकड़ लगाना शुभ होता हैं..।
जिस प्रकार हमारे यहां त्रिवेणी नीम, पीपल ओर बरगद के समूह को कहते है उसी प्रकार वहाँ पाकर,पीपल ओर बरगद के समूह को त्रिवेणी या हरिशंकरी कहते है, इसे लगाना बहुत पुण्यदायी माना गया हैं... इस हरिशंकरी में तमाम पशु- पक्षियों व जीव- जन्तुओं को आश्रय व खाने को फल ओर रहने को आश्रय मिलता है, अत: हरिशंकरी के रोपण, पोषण व रक्षा करने वाले को इन जीव जन्तुओं का आशीर्वाद मिलता है, इस पुण्यफल की बराबरी कोई भी दान नहीं कर सकता....।
हरिशंकरी का महत्व:-
यह कभी भी पूर्ण पत्तीरहित नहीं होती, इसलिए वर्षभर इसकेे नीचे छाया बने रहने के कारण
पथिकों व साधकों को छाया मिलती है। इसकी छाया भी दिव्य औषधीय गुणों से भरपूर होती है; जिससे नीचे बैठने वाले को पवित्रता, पुष्टता और ऊर्जा मिलती है।
इसका घना फैलाव पशु पक्षियों के आश्रय स्थल व भोजन का स्थान बन जाता है। पर्यावरण संरक्षण में हरिशंकरी को उत्तम माना जाता है।ऐसे सभी वृक्षों को धार्मिक स्थलों पर रोपित किया जाना चाहिए।
मनोज कुमार झा"मनु"
आचार्य
8650710405



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